रूहानी अनुभव
सैयद बाबा का जलवा
रूहानी शरण में जाना
मुसीबतों से धिरे लोगों को जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो ये सब उस रूहानी शरण में जाना चाहते हैं, जहां से मुसीबत-जदा लोगों को अपनी तकलीफों से निजात मिलनें की उम्मीद हो और तकलीफों से राहत मिलें । रूहानीं शरण कुछ भी हो सकती हैं, कहीं भी हो सकती हैं और किसी भी आकार में मिल सकतीं है ।
सौभाग्य से मुझे रूहानीं शरण बहुत भटकनें के बाद अपनें स्वयं के निवास में ही मिल गयी, सैय्यद बाबा के रूप में ।
मैं जिस मकान में रहता हूं , वह साठ पैंसठ साल पहले मुसलमानों का रिहायसी घर था । मेंरे पिता जी अविभाजित बंगाल में स्वतंत्रता और देश की आजादी से पहले मैंमनसिंह और कनाईघाट जिलों में व्यापार और खेती कराते थे । कालान्तर में देश का विभाजन हुआ और उपरोक्त दोंनों जिले और स्थान पूर्वी पाकिस्तान में चले गये । पिता जी पाकिस्तान में रहना नहीं चाहते थे अत: तीन मकान और कई एकड खेती मुसलमान और हिन्दू नौकरों के हवाले करके गांव चले आये । मूलत: हमारा पैतृक परिवार उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव शहर से 50 किलोमीटर की दूरी पर बसे सडक किनारे गांव में बसता है । पिता जी चूंकि अध्यवसायी और कर्मठ विचारधारा वाले व्यक्ति थे, अत: गांव आने के पश्चात वह व्यापार करनें के दृष्टिकोण से कुछ महीनों बाद सन् 1948/1949 कानपुर शहर आये और यहां सुविधा के उद्येश्य से मकान खरीदा , जहां हमारा परिवार अभी रहता है ।
मुसलमानों का मकान
यह मकान मुसलमानों का उन दिनों था । इस मकान के मालिक मकान बेचकर पाकिस्तान जाना चाहते थे अत: उन्हें एक खरीदार की जरूरत थी । खरीदार के रूप में मेंरे पिता जी उन्हे मिल गये । इनके दोमकान थे, अत: दोंनों मकान पिता जी नें खरीद लिये । उस समय मैं बहुत छोटा था और गांव में ही रहता था । गांव क्या था , इसे आजकल की भाषा में किसी शहर का बिना सुविधा युक्त हाता कहा जाय तो ज्यादा अच्छा होगा । आबादी यही कोई 300 के आसपास, बडे छोटे सब मिलाकर । कोई पक्की सडक नहीं । सबसे नजदीक की पक्की सडक लगभग 5 किलोमीटर दूर, यहां तक आनें जानें का साधन केवल बाई-साइकिल, बैलगाडी या पैदल, इसके अलावा कोई नहीं । बरसात के दिनों में तो हालत बहुत गम्भीर हो जाती थी । तब भी और आज भी सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन 7 किलोमीटर दूर है ।
उस जमानें में यही हाल था आनें जानें के लिये, हलांकि अब सब बदल चुका है और गांव घर तक पक्की अथवा खडंजादार सडके बन गयीं है । आनें जानें के साधन भी सुलभ हो गये हैं । मगर समस्यायें तो समस्यायें ही होती हैं चाहे वे किसी भी रूप में हों । मैं जब 7-8 साल का था तब पहली बार कानपुर शहर आया ।
बचपन में , जब गांव में था, तब आसपास , पडोस, बडे बजुर्गो से कानपुर शहर के बारे में सुनता चला आ रहा था । क्रांति स्थल था और अंग्रेजों के किस्से , कांतिकारियों की करगुजारी और इनके दृवारा किये गये अविस्वसनीय कार्य । तात्या टोपे, अजमल खान, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद आदि आदि क्रांति वीरों का यह शहर जो ठहरा । बहरहाल परिवार के एक एक करके सभी सदस्य कानपुर के इस मकान में आकर कुछ दिन रहते फिर गांव चले जाते, यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा । कारण यह था कि आदतें सब गांव वाली थीं, शहर के सांचें में ढलनें के लिये कुछ समय चाहिये था ।
एक एक करके गांव से सभी लोग कानपुर शहर आ गये और गांव का घर एक तरह से छोड़ना पड़ा । फिर भी साल , छह महीनें में माता जी, बहन जी और घर के दूसरे सदस्यों का गांव में आनाजाना लगा रहता । धीरे धीरे सबकी शादियां हुयीं । मेंरे बड़े भाई नें पिता जी का कारोबार संभाला । मैंनें आयुर्वेद और होम्यापैथी की प्रैक्टिस शुरू की । छोटे भाई वकालत के व्यवसाय से जुड़ गये ।
माता पिता के देहान्त के बाद सम्पत्ति का बंटवारा होंनें की स्थिति में मैं सबसें ज्यादा घाटे में रहा । रिश्तेदारों , नातेदारों और शुभेच्छुओं नें आपस में लड़ानें की बहुत कोशिश की । मैं बीच का भाई था । मैंनें बहुत से परिवारों को देखा था जो आपस की लड़ाई में बरबाद होकर महलों से निकलकर सड़क पर आ गये हैं । यही सब उदाहरण देखकर मैं सतर्क था और ऐसी नौबत न आवे इस का पहले से ही दृढ संकल्प कर रखा था । मेंरे भाइयों नें मेंरा हर तरह से हक मारा, तंग किया, लेकिन भविष्य की सुख, शांति , चैन के के लिये सब बर्दाश्त करके रह गया । यह सोच कर कि कभी न कभी अच्छे दिन आयेंगे तो यह सब घाटा पूरा करूंगा ।
पर अफसोस और दुख इसी बात का रहा कि अच्छे दिन कभी नहीं आये । यहां यह हाल है कि रोज कुआं खोदता हूं और रोज पानी पीता हूं । मैं हमेंशा कर्ज में डूबा रहा और इससे कभी भी नहीं उबर पाया । आज के दिन भी मैं कर्ज में हूं और मुझे लगता है कि मरते दम तक कर्ज मेंरा पीछा नहीं छोड़ेगा ।
मेरा मानना है कि ईश्वर नें भी मेरे साथ न्याय नहीं किया, उपर वाले नें भी बहुत नाइन्साफी की है । पिछले कई दशकों से मैं बहुत बुरे दिनों के दौर से गुजर रहा हूं । यह त्रासदी मेरे जीवन के साथ जुड़ी हुयी है । 62 वर्ष की उम्र में भी मुझे चैन नहीं है । सोचता हूं सन्यास ले लूं और किसी गांव मे अपना डेरा जमा लूं और जीवन के बाकी बचे दिन सबकी सेवा मे लगा दूं ।
सामाजिक , आर्थिक, पारिवारिक, कानूनी, सरकारी आदि सभी क्षेत्रों से मुझे जितनी अपेक्षा थी वह कतई नहीं मिली । समस्यायों के झंझावातों से जूझते जूझते अब इतनीं भी सामर्थ्य नहीं बची कि कुछ और नया करनें के लिये विचार करूं । मियां भाई की सलाह पिछले कई सालों से मैं काफी परेशान था । मैं अपनी लड़की की शादी को लेकर बहुत चिन्तित था । कई वषों से लड़के की तलाश कर रहा था । हर जगह नाकामी मिल रही थी । जाहिर है कि मानसिक फ्रस्ट्रेशन बढ़ता है । मेंरे पास लगभग 60 वर्ष उम्र के दो मुसलमान मरीज, एक महिला और एक पुरूष, इलाज के लिये आया करते हैं । मैंने अपनें इस मकान के बारे में जिक्र किया कि किसी समय यह मकान मियां भाइयों का था । मैनें अपनी कठिनाइयों और तकलीफों का जिक्र किया और मेंरे साथ क्या मुसीबतें बीत रही है , इन सब बातों का खुलासा किया । यह बात पिछले साल, सन् 2006, शायद दीपावली त्योहार के बाद की है । इन मुसलमान सज्जनों का मानना था कि यह मकान बहुत पुराना है, हो सकता हैं 500 वर्षों से अधिक का हो । जाहिर है , इस मकान में रहनें वालों की बहुत सी तमन्नायें, इच्छायें होगी , इन सब लोंगों का इस मकान से आत्मिक जुड़ाव होगा । इस घर के लोग मरनें के बाद स्थानीय कबरिस्तान में दफनाये गये होंगे । न जानें कितनी बार इस मकान में पवित्र कुरान का पाठ किया गया होगा और धार्मिक अनुष्ठान किये गये होंगें। यह मकान मस्जिद से मिला हुआ है । हो सकता है कोई रूह या रूहें आपके माध्यम से अपनी बात कहना या कराना चाहती हों । मां ने बताया मैंने अपनें बचपन का एक किस्सा उनको बताया, जो मेंरी मां घर के सदस्यों को अक्सर बताया करती थीं । पुरानें मकान में माता जी कभी कभी एक बुजुर्गवार , उम्रदराज व्यक्ति का साया देखती थीं , सफेद दाढ़ी, सफेद नमाजी टोपी , सफेद कुर्ता पैजामा पहनें हुये लगभग औसत लम्बाई के , जो आंगन के एक कोंनें में चुपचाप धीर गंभीर मुद्रा में बैठे हुये चिंतन करते हुये दिखाई देते थे । हलांकि उन्हें मैनें कभी नहीं देखा । शायद डर की वजह से , मैं मकान के उस हिस्से की तरफ जाता ही नहीं था । नये मकान में यद्यपि र्निमाण के बाद काफी कुछ नक्शा बदल गया । फिर भी मैंनें उस स्थान को लोकेट करनें की कोशिश की । मैंने मियां भाइयों को अन्दाज से बताया कि आंगन का यह हिस्सा बुजुर्गवार के बैठनें का हो सकता है । मेंरी बात समझनें के बाद मियां भाइयों नें सलाह दी कि मैं सैयद बाबा का एक आला बनाकर उसमें रोजाना शाम ढले एक दीपक जला दिया करूं । मेंरे इस नये मकान में एक भी दियाला नहीं बना है । दियाला पुरानें मकान में कई एक बनें हुये थे , जिनमें हम लोग छोटी मोटी सामान रख दिया करते थे । यह बात मैनें मियां भाइयों को बताई कि इस नये बनें हुये मकान में एक भी दियाला नहीं है । रोजाना चिराग जलानें की हिदायतइसका समाधान भी मियां भइयों नें निकाला । उन्होंनें इधर उधर कमरे में नजर दौड़ाई और एक कोनें की तरफ इशारा करके बताया कि कुछ ईंटे रखकर दियाला बना लूं और शाम ढ़ले चिराग जला दिया करूं ।मैंनें बिना नागा किये चिराग जलाना शुरू किया । मैं सैयद बाबा से रोजाना कहता था कि मेंरी बेटी की शादी जल्द से जल्द करायें । पैसा मेरे पास था नहीं । मैं सोचता था कि कैसे शादी कर पाउंगा । लड़का ढूंढते ढ़ूढते हताशा की स्थिति में पहुंच गया था, लडंकी की उम्र भी बढ़ रही थी । लड़की 32 वर्ष की उम्र में चल रही थी। पिछले पांच वर्षों से लड़का तलाश रहा था ।कर्ज लेकर शादी एक दिन विचार आया कि क्यो न अखबार में वैवाहिक विज्ञापन दिया जाय । लगभग 40 हजार के करीब रूपया लड़का खोजनें में ही खर्च हो चुका था । अखबार में विज्ञापन देंनें का आइडिया कभी सोचा भी न था । लेकिन कोई अदृश्य शक्ति मुझे इसके लिये प्रेरित कर रही थी । मैंनें लोंगों से सुन रखा था कि अखबार के माध्यम से होनें वाले विवाह सम्बन्धों मे कुछ अनावश्यक कठिनाइयां आती हैं । लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ । कुछ दिन बाद पता चला कि लड़के वाले मेंरे निकटतम रिश्तेदार निकल आये । मेंरे पास शादी के लिये पैसा भी नहीं था । इसी कारण से शादी भी नहीं कर पा रहा था । लड़की 31 वर्ष की उम्रपार कर चुकी थी । सब कुछ भगवान भरोसे था । मैं रोज शाम को या रात को चिराग जलाता और सैयद बाबा से प्रार्थना करता कि सब कुछ ठीक से निपटायें । मैनें बैंक से कर्ज लिया और कर्ज करके शादी की । शादी उम्मीद से ज्यादा अच्छी हुयी और सब शांती पूर्वक निपट गया । शादी 27 जून 2007 को हुयी । अब मै कर्ज से मुक्ति के लिये सैयद बाबा से रोजाना प्रार्थना करता हूं । जब भी चिराग जलाता हूं सैयद बाबा से प्रार्थना करता हूं कि ‘’ बाबा जल्द से जल्द कर्ज से मुक्ति दिलायें, जल्द से जल्द कर्ज से मुक्ति दिलायें, जल्द से जल्द कर्ज से मुक्ति दिलायें ‘’ । मुझे सैयद बाबा पर पूरा विश्वास है कि वो मेंरी बात अवश्य सुनेंगें और शीघ्र से शीघ्र कर्ज से मुक्ति दिलायेंगें । मेंरे उपर कई बैंको का लगभग सात लाख से उपर का कर्ज है ।
